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अब्दुल केवल पंक्चर ही नही बनाता है, वो रॉकेट भी उड़ाता है और दुश्मनों के घातक टैंकों को भी…

“अब्दुल केवल पंक्चर ही नही बनाता है, वो रॉकेट भी उड़ाता है और दुश्मनों के घातक टैंकों को भी…” शत्रुओं के लिए काल माने जाने वाले अजेय अमरीकी पैटन टैंकों को ध्वस्त करने वाला वो 32 वर्षीय अब्दुल, 21 वर्ष की आयु में सेना में शामिल होता है। 1962 के चीनी युद्ध में दुश्मनों के दांत भी खट्टे करता है। और अंततः 1965 की जंग में पाकिस्तान के विरुद्ध लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हो जाता है।

अब्दुल केवल पंक्चर ही नही बनाता है, वो रॉकेट भी उड़ाता है और दुश्मनों के घातक टैंकों को भी…
Photo : Google

प्रत्येक वीर की अपनी शौर्य गाथाएँ होती हैं, परंतु ‘परमवीर’- स्वयं में वीरता का एक ग्रंथ है- जो आने वाली नस्लों के लिए एक नज़ीर है। भारत ऐसी महान विभूतियों से आभूषित है। और उनमें से ही एक ऐसे कोहिनूर थे – परम वीर चक्र अब्दुल हमीद

कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद – 1 जुलाई 1933 में उत्तरप्रदेश के गाजीपुर स्थ‍ित धरमपुर गांव में जन्मे वीर अब्दुल हमीद कुश्ती के दांव-पेंच, लाठी चलाना और गुलेल से निशानेबाजी में माहिर थे। उन्होंने 1954 में 21 वर्ष की आयु में वे सेना में भर्ती हुए और 27 दिसंबर 1954 को ग्रेनेडियर्स इंफ्रैंट्री रेजीमेंट में शमिल हो गए। जम्मू-कश्मीर में तैनात अब्दुल हमीद द्वारा एक पाकिस्तानी आतंकवादी डाकू इनायत अली को पकड़वाने पर प्रोत्साहन स्वरूप पदोन्नति मिली और वे लांसनायक बना दिए गए।

अब्दुल केवल पंक्चर ही नही बनाता है, वो रॉकेट भी उड़ाता है और दुश्मनों के घातक टैंकों को भी…
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शहीद वीर अब्दुल हमीद के पिता अपने क्षेत्र के मशहूर पहलवानों में गिने जाते थे, लेकिन गरीबी की वजह से आजीविका के लिए वह सिलाई का काम करते थे। बेहद तंगी की हालत में पहलवान मोहम्मद उस्मान खलीफा ने अपने बड़े बेटे वीर अब्दुल हमीद को किसी तरह 5वीं तक की पढ़ाई पूरी करवाई।

सेना में भर्ती होने के बाद सबसे पहली बार 1962 में भारत-चीन युद्ध में अब्दुल हमीद ने अपनी वीरता दिखाई। गोलियों से घायल होने के बावजूद घुटनों और कोहनियों के बल पर चलते हुए अब्दुल ने चीन द्वारा कब्जा किए गए 14-15 किलोमीटर एरिया को क्रॉस करते हुए भारत-चीन के ओरिजिनल बॉर्डर पर तिरंगा लहराया था।

1965 की भारत-पाक जंग के दौरान दुश्मन देश की फौज ने अभेद पैटन टैंकों के साथ 10 सितंबर को पंजाब प्रांत के खेमकरन सेक्टर में हमला बोला। भारतीय थल सेना की चौथी बटालियन की ग्रेनेडियर यूनिट में तैनात कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप में सवार दुश्मन फौज को रोकने के लिए आगे बढ़े।

हमीद ने पैटन टैंकों का ग्रेनेड के ज़रिए सामना करना शुरू कर दिया। दुश्मन फौज हैरत में पड़ गई और भीषण गोलाबारी के बीच पलक झपकते ही उनके एक अचूक निशाने ने पाक सेना के पहले पैटन टैंक के परखच्चे उड़ा दिए। मोर्चा संभाले अब्दुल हमीद ने पाक फौज की अग्रिम पंक्ति के सात पैटर्न टैंकों को चंद मिनटों मे ही धराशायी कर डाला।

देखते ही देखते भारत का “असल उताड़” गाँव “पाकिस्तानी पैटन टैंकों” की कब्रगाह बन गया। लेकिन भागते हुए पाकिस्तानियों का पीछा करते अब्दुल हमीद की जीप पर एक गोला गिर जाने से वे बुरी तरह से घायल हो गए और अगले दिन 9 सितम्बर को उनका स्वर्गवास हो गया लेकिन उनके स्वर्ग सिधारने की आधिकारिक घोषणा 10 सितम्बर को की गई थी।

इस युद्ध में साधारण “गन माउनटेड जीप” के हाथों हुई “पैटन टैंकों” की बर्बादी को देखते हुए अमेरिका में पैटन टैंकों के डिजाइन को लेकर पुन: समीक्षा करनी पड़ी थी।

अपने भाषणों में उलेमाओं और मुस्लिम धर्मगुरुओं को क़ुरान और हदीस से आगे बढ़कर ऐसे विरले उदाहरणों को भी क़ौम के नौजवानों के बीच आम करना चाहिए ताकि यह संदेश जन जन तक पहुँचे कि अब्दुल केवल पंक्चर ही नही बनाता है, वो रॉकेट भी उड़ाता है और दुश्मनों के घातक टैंकों को भी।

माँ भारती की हिफ़ाज़त के लिए खुद को न्यौछावर करने वाले परमवीर चक्र से सम्मानित वीर अब्दुल हमीद जी को उनकी जयंती पर शत शत नमन !

साभार – ©ज़हीन इदरीसी के फेसबुक वॉल से।

चित्र स्रोत : गूगल

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