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धरती का ताप बढ़ा हो, आसमान से आग बरस रही हो, जोड़ों में दर्द हो और मुहल्ले में पत्थरबाजी हो तो क्या करें….. आइए शुक्रवार को साइकिल चलाएं ! भाईचारा घुटनों के बल रेंगता हुआ आएगा |

भारत कथा व्यास - पंडित रुपेश जी महाराज ।

धरती का ताप बढ़ा हो, आसमान से आग बरस रही हो, जोड़ों में दर्द हो और मुहल्ले में पत्थरबाजी हो तो क्या करें………. आइए शुक्रवार को साइकिल चलाएं !  कुछ काम ऐसे होते हैं जिनके लिए हमे न तो समाज में किसी से अनुमति लेनी होती है, न परिवार में और न सरकार से | ऐसे काम लोकहित में सर्व स्वीकार्य होते हैं । सबसे अच्छी बात ये होती है कि ऐसे कामों के परिणाम स्वतः ही दूसरों को प्रेरित करते हैं । लोग भी ऐसा काम करें इसके लिए कोई प्रचार अभियान चलाने की जरूरत नहीं पड़ती । शुक्रवार को साइकिल चलाना ऐसा ही एक काम है | चाहे तो हम शुक्रवार को पत्थरबाजी वार की बजाय साइकिल वार बना सकते हैं | कर के देखिए ज्यादा सुखद परिणाम मिलेंगे |

कोई पूछ सकता है कि साइकिल चलाने से क्या होगा ? साइकिल चलाने का धरती के बढ़ते ताप को रोकने से क्या संबंध ? साइकिल चलाने का आसमान से बरसती आग रोकने से क्या संबंध ? जोड़ों का दर्द दूर करने का साइकिल चलाने से क्या वास्ता, और तो और भला शुक्रवार की पत्थरबाजी पर साइकिल चलाने से कैसे लगाम लगेगी ? फिर कह रहा हूं कर के देखिए, परिणाम न मिले तो जो कहिए हार जाऊंगा | शर्तिया इलाज है | बाबा रहमानी की तरह नहीं |

कोई पूछ सकता है साइकिल चलाने से कोई लाभ है तो शुक्रवार ही क्यों ? किसी भी दिन चलाया जाए और रोज भी चलाया जाए | मैं भी यही कहूँगा कि साइकिल चलाने के इतने लाभ हैं कि हम शुक्रवार ही नहीं किसी भी दिन चला सकते हैं और अगर रोज साइकिल चलाएं तब तो बात ही क्या है | शुक्रवार तो बस वो प्रस्थान बिन्दु है कि हम शुरू कर दें |

साइकिल चलाना शुरू करने के लिए शुक्रवार का चयन इसलिए भी किया गया है कि हमे थोड़ा संतोष करना पड़ेगा, संयम बरतना पड़ेगा | आजकल संयम बरतने के लिए भी बहुत सारे संतोष करने पड़ते हैं | संतोष, के लिए शुक्रवार से अच्छा कोई दिन नहीं है शायद | शुक्रवार को हमने संतोषी माता का दिन माना है, भले ही सिनेमा के कारण | लेकिन एक समय में अद्भुत क्रांति आयी और जब देश को अन्न संकट से बचाना हुआ तो घर-घर संतोषी माता का व्रत रखा जाने लगा, ठीक वैसे ही जैसे शास्त्री जी के आह्वान पर शनिवार को खिचड़ी खाई जाने लगी | तो साइकिल चलाने के लिए जो संतोष करना पड़ेगा उसका दुख हमें न हो, हम सुखपूर्वक साइकिल चला सकें इसके लिए शुक्रवार का दिन ही शुभ है | जो रोज चला सकें उनका स्वागत ठीक वैसे ही किया जाना चाहिए जैसे कोई योद्धा युद्ध जीत कर आता है | तो जब शुक्रवार को साइकिल चलाएंगे तो इसका लाभ हमें अपने स्वास्थ्य के रूप में, देश के आर्थिक स्वास्थ्य को ठीक कर देश को समृद्ध करने के रूप में और सबसे ज्यादा प्रकृति संरक्षण कर उसकी सेवा करने के रूप में मिलेगा | आप पूछ सकते हैं कैसे ?

सबसे पहले बात स्वयं के स्वास्थ्य की | आजकल सबसे ज्यादा दिल के बीमार हैं यानि हार्ट पेसेन्ट | दिल के रोग के बढ़ने का एकमात्र कारण है धमनियों में रक्त का जाम होना जाना है | इसका सबसे बड़ा कारण शरीर श्रम वाला कोई काम हमारे पास न होना है | दिल तब अच्छे से धड़कता है यानि काम करता है जब हम श्रम करते हैं | श्रम करने से रक्त यानि खून मोटा होकर धमनियों में जमता नहीं और दिल की धड़कन रुकती नहीं | अगर हम खेती, पशुपालन जैसे किसी श्रम के काम कर रहे होते तो हम दिल की बीमारी से बच सकते थे लेकिन चूंकि हमारे जीवन से श्रम निकल गया है तो अब हार्ट की बीमारी आम हो गयी है | इसका सबसे अच्छा इलाज है साइकिल चलाना | साइकिल चलाने से पैरों के अलावा दिल सबसे ज्यादा मजबूत होता है | जिनके पास पैसा है वो लोग आजकल घर मैं दौड़ने वाली मशीन रखते हैं | लेकिन उससे सिर्फ उनकी सेहत में कुछ सुधार होता है | उससे समाज या राष्ट्र की सेहत में कोई सुधार नहीं होता |

इसी तरह आजकल आयुर्वेद में जिसे वात रोग कहते हैं वह बढ़ा हुआ है | वात रोग के कुछ प्रकार जैसे गैस बनना, हड्डियों और जोड़ों में दर्द होना, खास कर घुटनों और हाथ की कोहनियों में दर्द होना | गठिया रोग | ये सब वात के विभिन्न रोग हैं | ये शरीर में वायु दाब बढ़ जाने से होता है | चिकित्सकों के पास जाइए तो वो कुछ दवा देंगे और फिर बताएंगे थोड़ा श्रम करिए, कुछ नहीं तो पैदल चलिए | एक समय था जब हमारे पास घर में ही विशेष रूप से महिलाओं के पास ऐसे अनेक काम थे जिनसे हाथ-पैरों को भरपूर काम मिलता था और ऐसे जोड़ों के दर्द से ताउम्र मुक्ति मिलती थी | लेकिन अब हमारी जीवन शैली ऐसी हो गयी है जिसमें खान पान बहुत बदल गया है | तो ऐसे सभी लोगों के लिए जिनके घुटनों में दर्द हो उनके लिए साइकिल चलाना राम बाण दवा हो सकती है | श्रम करेंगे तो शरीर में बनने वाली गैर जरूरी वायु के दाब से भी मुक्त रहेंगे | ये तो हुई साइकिल चलाने से निजी स्वास्थ्य का लाभ |

अब, आते हैं साईकिल चलाकर, धरती के ताप को कम करने और आसमान से बरसती आग से प्रकृति को संरक्षित रखने के उपाय पर | दुनिया का हर पर्यावरण वैज्ञानिक चेतावनी दे रहा है कि धरती दिन-प्रतिदिन गरम होती जा रही है | इसका सबसे बुरा असर मानव सहित मानव के लिए उपयोगी उन तमाम जीव-जंतुओं पर पड़ रहा है जिनका होना हमारे लिए जरूरी है | सवाल उठता है कि क्या केवल साइकिल चलाकर हम प्रकृति का संरक्षण कर सकते हैं | मैं पूरी जिम्मेदारी से ही नहीं दावे से कह रहा हूं कि भारत का प्रत्येक नागरिक रोज नहीं केवल शुक्रवार को ही एक दिन साइकिल से अपना काम करे तो हम प्रकृति को इतना संरक्षित कर पाएंगे कि आग बरसाने वाली सूरज की किरणों से हमें मोहब्बत हो जाएगी | जानिए, क्यों और कैसे ?

आज धरती का ताप बढ़ने के दो कारण हैं एक, हम आवश्यक पेड़-पौधों का संरक्षण नहीं कर रहे | हमारी विकास की नीति में गति सबसे महत्वपूर्ण हो गयी है और हम जरूरी गैर जरूरी हर वह काम कर रहे हैं जिनसे पेड़-पौधों को नुकसान हो रहा है | वैज्ञानिक कहते हैं वातावरण में गरमी बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कार्बनडाई आक्साइड, कॉर्बन मोनो आक्साइड और मेथेन गैसों का बढ़ना है | ये सब बढ़ते हैं ज्यादा डीजल-पेट्रोल और वातानुकूलित यंत्रों यानि एसी के इस्तेमाल से | हमारी विकास नीति कहती है हम जीतना ज्यादा पेट्रोल-डीजल का इस्तेमाल करेंगे, जीतना ज्यादा एसी का इस्तेमाल करेंगे उतने ज्यादा विकसित कहे जाएंगे | जबकि पर्यावरण नीति और स्वास्थ्य नीति कहती है कि वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए और खुद भी स्वस्थ्य रहने के लिए आपके आसपास इन गैसों का होना हानिकारक है | तो सवाल उठता है कि हमारे पास उपाय क्या है ?

कभी हमारे घरों की डिजाईन ऐसी थी कि हमें सामान्यतः या सतर्क होकर अपने स्वास्थ्य और प्रकृति के स्वास्थ्य के बारे में नहीं सोचना होता था | घरों में खिड़कियां ज्यादा थीं, कांच का उपयोग (खिड़कियों और दीवालों में) लगभग नगण्य था | आसपास पेड़-पौधे होने से एसी की जरूरत ही नहीं थी | निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक वाहनों से आवागमन ज्यादा था | अब तो घर में जीतने लोग उतनी गाड़ियां | घर, बन ही रहे हैं एसी कहाँ और किस तरफ लगेगा, इसको ध्यान में रखकर | दुकान की दीवालों, खासकर शोरूम वाली दुकानों और दफ्तरों में कांच का इस्तेमाल अंधाधुंध हो गया है | स्वाभाविक है इससे सूरज की गर्मी के ताप का असर बढ़ेगा ही | पहले घरों में ऐसी धातुए इस्तेमाल होती थीं जिनकी भूमिका धरती और आसमान का ताप कम करने की रहती थी | मिट्टी, लकड़ी आदि | लेकिन, अब हमारा विकास हो गया है | तो उपाय ये है कि घरों में एसी की बजाय खिड़की लगा सकें तो अच्छा | नहीं तो आसपास कुछ पेड़ पौधे लगा सकें तो और अच्छा | घर की डिजाईन बदल सकें, उसका मटेरियल बदल सकें तो खूब अच्छा | लेकिन जो लोग दफ्तर या बाजार जाने वाले हैं वो अगर शुक्रवार को अपनी गाड़ी को आराम देकर साइकिल से जाएं तो सबसे अच्छा | यह आराम से किया जा सक्ने वाला काम है |

केवल एक दिन साइकिल चलाने से धरती के ताप में कितनी कमी आयी, यह विश्वविद्यालयों के हमारे वैज्ञानिकों के शोध का नया विषय होगा | और, शुक्रवार को जब हम साइकिल से अपना काम करेंगे तो उसका असर शनिवार और रविवार को भी दिखेगा | क्योंकि शनिवार को लगभग आधा सरकारी दफ्तर बंद रहता है और रविवार को तो दफ्तर और बाजार दोनों बंद होने से पहले से ही लाभ मिल रहा है | तो इसीलिए शुक्रवार को साइकिल चलाने का काम बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि सप्ताह के सात दिनों में अगर हमें सिर्फ एक दिन की मेहनत से तीन दिन प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा हो तो शेष चार दिनों में होने वाले नुकसान की भरपाई करना आसान हो जाएगा | बस, एकबार आदत डालने की जरूरत है |

यह तो हुई अपने और धरती के स्वास्थ्य की बात | अब आते हैं अपने और देश के आर्थिक स्वास्थ्य की बात पर | भारत सरकार जब बजट बनाती है तो उसमें कई प्रकार के खर्चे होते हैं | उसमें एक खर्च होता है अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं (विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि) से विकास की योजनाओं के लिए लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाना (ध्यान रहे कर्ज चुकाना नहीं, कर्ज का व्याज चुकाना) आपके संपर्क में कोई जानकार आदमी हो तो उससे समझ सकते हैं कि यह रकम कितनी होती है | कर्ज और कर्ज का व्याज चुकाने के लिए सरकार कोई अतिरिक्त कमाई नहीं करती, वह हमसे आपसे ही विभिन्न रूपों में टैक्स लेती है | आप सड़क पर चलते हैं तो कितना टैक्स देते हैं, जिस दिन इसकी सच्चाई जनता को पता चल जाए जनता कहेगी सड़क वाली विकास नीति नहीं चाहिए |

खैर, इस कर्जे और व्याज की जो भरपाई हम करते हैं उसे हम अपनी बचत से कमा सकते हैं | मान लिया जाय एक आदमी नियमित रूप से मात्र 50 रुपए का डीजल-पेट्रोल खर्च कर रहा है तो वह महीने में लगभग 1500 का डीजल-पेट्रोल खर्च करता है | अब अगर महीने के चार शुक्रवार ही माने तो, अगर वह चार दिन गाड़ी की बजाय साइकिल से चलता है तो उसे महीने में 200 रुपये की बचत होगी | यह बचत उसकी कमाई है | पहले वह डीजल-पेट्रोल की बचत नहीं करता था तो उसके बचत की कोई कमाई नहीं थी | अब, इसी तरह यह माने कि एक महीने में विभिन्न रूपों में आपके द्वारा दिया जाने वाला टैक्स (जो कि कर्ज का सिर्फ व्याज चुकाने में जाता है) भी 200 रुपया ही हो तो पहले आपकी बचत से कमाई कुछ नहीं थी अब 200 रुपये है सिर्फ 4 दिन साइकिल चलाने से और उसी बचत को आपने टैक्स में दे दिया क्योंकि वह देना मजबूरी है (भले ही वह टैक्स आपने नहीँ भारत सरकार ने विकास के नाम पर लिया हो, और किसका विकास हुआ आपको पता भी नहीं) तो भी आपका 200 रुपया महीना बचा | अब जरा इस हिसाब को बड़ा करिए | 200 रुपये को घर में जीतने गाड़ी चलाने वाले हैं सबके साथ हिसाब लगाइए तो औसतन एक घर में महीने में 600 से 800 रुपये बचेंगे | और पूरे मुहल्ले में जितनी गाड़ियां हैं सबका हिसाब लगाइए फिर शहर में और फिर देश में |

मैं तो कहता हूं कि देश के केवल आधे गाड़ी चलाने वाले ही केवल शुक्रवार को अपना काम साइकिल से करने लेगें तो अपना भी और देश का भी आर्थिक स्वास्थ्य सुधरने में समय नहीं लगेगा | फिर पेट्रोल-डीजल के नाम पर देश के किसी निजी आंतरिक मामले में कतर जैसा कोई पिद्दी देश हमें आँख दिखाना तो दूर हमारी तरफ देखने की जुर्रत भी नहीं करेगा | भारत को दुनियां की जितनी जरूरत है उससे ज्यादा दुनियां को भारत की जरूरत है | भारत की विस्तृत जनसंख्या उसकी कमजोरी नहीं है उसकी ताकत है | हमारी इस जनसंख्या के लालच में ही दुनियां के अरबपति ललचाई निगाहों से भारत आ रहे हैं |

एकबार हमने सिर्फ शुक्रवार को साइकिल चलाना शुरू किया नहीं कि पत्थरबाजों के घरों में चूल्हा जलना बंद हो जाएगा | धार्मिक चंदे के नाम पर चलने वाला धंधा पेट्रोल और डीजल की कमाई से ही चलता है | जिसकी सबसे बड़ी कीमत भारत चुकाता है | आइए शुक्रवार को साइकिल चलाएं पत्थरबाजी तो शर्तिया बंद होगी, भाईचारा घुटनों के बल रेंगता हुआ आएगा |

भारत कथा व्यास – पं.रूपेश जी महाराज

ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष त्रयोदशी,

12 जून 2022, वाराणसी । यह लेख भारत कथा व्यास पंडित रुपेश जी महाराज द्वारा लिखी गई है। 

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