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मैं मिला हूं उन लड़कों से… वह भी घर छोड़ते हैं, उन्हें भी घर की याद आती है। लेकिन वह रोते नहीं…

यह लेख उन सभी लड़कों को समर्पित है जो घर से बाहर अपनों से दूर कुछ सपनों को पूरा करने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं और घर से दूर अपनों की याद आने पर उनके साथ सिर्फ उनकी दोस्ती होती है। पूरे लेख में पढ़ने के दौरान आपको अपने कॉलेज के दिन, करियर बनाने के संघर्ष के दिन, माता-पिता के सपनों के लिए मेहनत करते दिन आदि सभी क्षण आंखों के सामने करते नजर आएंगे।

मैं मिला हूं उन लड़कों से जो घर से निकलते तो है खुद के सपने लेकर लेकिन समय की मार के आगे घुटने टेक कर वह अपनों के सपने पूरे करने में लग जाते हैं। हालांकि कुछ लड़के अपनों के सपनों के लिए भी घर से निकलते हैं, लेकिन उन सपनों को पूरा करते-करते वह खुद को खो देते हैं। वह लड़कपन खो देते हैं। वह भी घर छोड़ते हैं, उन्हें भी घर की याद आती है। लेकिन वह रोते नहीं है क्योंकी लड़के रोते नहीं है।

मैं मिला हूं उन लड़कों से, जो की बड़े बाल और बड़ी दाढ़ी में खुद को छुपा लेते हैं, लेकिन धीरे धीरे इनके बाल और दाढ़ी भी उनके सपनों की तरह इनका साथ छोड़ने लगती है। धीरे-धीरे वह भी पकने लगती है। मैं मिला हूं उन लड़कों से, जो किताबों में खो गए हैं, जो मशीनों की नीचे सो गए हैं, जो कंप्यूटर के आगे रो रहे हैं, जो फाइलों में खुद को खो रहे हैं। फिर भी जिंदगी से मिलते वक्त वह मुस्कुराते हैं। वह गुनगुनाते हैं और दुनिया की नजर में वह लड़के बेपरवाह बन जाते हैं।

मैं मिला हूं उन लड़कों से जिनके सपनों में खुद के लिए सपने नहीं होते हैं। जो दौड़ते हैं लंबी रेस में, जो की उनकी खुद की रेस कभी नहीं होती। ऐसे लड़कों का सपना तो महज इतना सा ही था कि अपने दोस्त की सेकंड हैंड स्प्लेंडर की पिछले सीट पर अपनी महबूबा को बैठाकर बाइक चला सकें, जिनके लिए बाइक मोटरसाइकिल होती थी। महबूबा को भी मोटरसाइकिल पर बस इसलिए बैठाना था ताकि साइड मिरर से बार-बार अपनी महबूबा के उड़ते हुए बालों को देख सकें। उनका सपना सेकंड हैंड स्प्लेंडर ही था, लेकिन खुद को खुद से मिलाते मिलाते, वह खुद से बहुत दूर चले जाते हैं। मैं मिला हूं लड़कों से जो खुद के लिए जीने से पहले दूसरों के लिए जीना चाहते हैं।

मैं मिला हूं उन लड़कों से जिनकी मुस्कुराहट झूठी होती है। वह निकम्मे होते हैं। गैर जिम्मेदार होते हैं। उनके गंदे कपड़ों से बदबू आती है। शायद वो कई दिन तक नहा भी नहीं पाते हैं। वह जल्दी किसी भगवान के आगे सर भी नहीं झुकाते हैं। ऐसा नहीं कि वह भगवान को नहीं मानते, बस वह दूसरों के लिए जीने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि खुद के लिए कुछ मांगना, भगवान के आगे झुकना, भगवान को समझना, शायद अब उन्हें समझ में नहीं आता….

ऐसे लड़के जो हाथों में गिर्स लगाए उंगलियों में फाइलों को चिपकाएं, दिमाग को काम पर लगाएं, कंप्यूटर पर नज़रे टिकाएं, अपने गांव अपने माटी से ना जाने कितनी दूर मुस्कुराने की झूठी कोशिश में मुस्कुरा रहे हैं। रात को 11:40 पर वह अपनी सेकंड हैंड स्प्लेंडर को बाहर खड़ी करके मैगी चावल बना कर खा रहे हैं। मैं मिला हूं उन लड़कों से…

मां- बाप के सपनों के खातिर वो सोते नहीं।
खुद को उपहार देने के पैसे होते नहीं।

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