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“फेहरिश्त”- तुम कश्मीर में हो… मेरे लिए थोड़ा सा श्रीनगर, थोड़ा सा सोनमर्ग लाना…

रचनाकार - श्रीमती उमा त्रिपाठी ।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा एवं सुप्रसिद्ध रचनाकार श्रीमती उमा त्रिपाठी जी द्वारा रचित कविता के अंश- कश्मीर में 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों पर हुए नरसंहार पर फिल्म “द कश्मीर फाइल्स” रिलीज के बाद से ही कश्मीर से जुड़ी यादें और स्मृतियां हर व्यक्ति साझा कर रहा है। उन्हीं स्मृतियों से जुड़ी आदरणीय श्रीमती उमा त्रिपाठी जी की कविता-

Photo : Social media

फेहरिश्त

तुम कश्मीर में हो
मेरे लिए कुछ सामान लाना
थोड़ा सा श्रीनगर,
थोड़ा सा सोनमर्ग
और मिल जाये तो
जरा ज्यादा सा
गुलमर्ग लाना

Photo : Social media

अखरोट की लकड़ी
का बुद्धा लाना
शान्ति के लिए जब सारे प्रयास कम पड़ जायेंगे
तो यही बुद्धा सही
मार्ग दिखाएंगे

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श्रीनगर में है शंकराचार्य
की पहाड़ी, थोड़ा चढ़ना होगा, ऊँचाई पर है, पर तुम्हारी  जवानी के आगे कुछ भी नहीं

वहाँ सनातन धर्म की
ध्वजा फहरती है ,
मिल जाए तो अद्वैत
का मंत्र लाना

डल झील में बहती है
हिंदुस्तान की आत्मा
अजर, अमर, होकर
उसे अपनी अंजुली में
लेकर कहना हे डल
कुछ भी हो जाए
तुम इसी तरह बहना

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झेलम का चांदी सा पानी
अपनी अंजुलीं में भरना और छोड़ देना, उसी में
तुम्हारा स्पर्श ही तुम्हारा प्यार है इस देश के लिए
उसे सरहद के इस पार से उस पार तक फैला देना

पश्मीना नहीं, उन हाथों को
चूमना, जो नहीं जानते कि
अगर कोई पश्मीना लेता है तो वह उस ऊष्मा को ओढता है, जो तुम्हारे
हाथों में है, बुनते समय
हम ही तो होते होंगें
ख्यालों में, रोटी में, जीवन में

Photo : Social media

तुम वहाँ मिट्टी पर, बर्फ पर, चीनार के पेड़ों में हज़ारों बार लिखना शान्ति, सदभाव, प्रेम अंतिम विकल्प है, बच्चों का सुनहरा भविष्य है, उनके हाथों पत्थर नहीं अच्छा लगता,

हाथ बहुत नाजुक हैं , उस पर केसर के पीले रंग से

प्यार लिख देना और उस पीले रंग को धरती से आसमान तक फैला देना
जब कश्मीर गए हो तो
ये सब समान ले आना।

(मेरा छोटा बेटा कश्मीर भ्रमण पर है। उनसे जो समान मंगवाया है उसकी फेहरिश्त – उमा त्रिपाठी)

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