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गुड़ी पड़वा का पर्व कैसे और क्यों मनाते हैं ? : GUDI PADWA

गुड़ी का अर्थ है ध्वज अर्थात झंडा और पड़वा का अर्थ है प्रतिपदा तिथि। हिंदू धार्मिक मान्यता अनुसार गुड़ी पड़वा के दिन ही जगतपिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ किया और सतयुग की शुरुआत इसी दिन से हुई थी। जिस कारण इस दिन को सृष्टि निर्माण प्रारंभ के दिन के नाम से भी जानते हैं। इस दिन से ही नवरात्रि प्रारंभ होता है और ध्वजारोहण, नव संवत्सर आदि का पूजा इत्यादि होता है।

हिंदू पंचांग के मान्यता अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से भारतीय नव वर्ष का प्रारंभ माना जाता है और इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। हिंदू धर्म में गुड़ी पड़वा को महत्वपूर्ण रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष गुड़ी पड़वा 2 अप्रैल को है। मान्यता अनुसार घर की महिलाएं सुबह सूर्योदय से पूर्व स्नान कर विजय के प्रतीक के रूप में घर में सुंदर बूढ़ी अर्थात झंडा “ध्वज” लगाकर पूजन करती हैं। विशेष तौर पर यह पॉवर दक्षिण भारत में मनाया जाता है परंतु अब समूचे भारत में इसका चलन बढ़ गया है। मान्यता है कि गुड़ी पड़वा के दिन घर पर ध्वज लगाकर पूजा करने से सुख समृद्धि बढ़ती है और नकारात्मकता दूर होती है।

रामायण की धार्मिक कथा अनुसार-

रामायण के समय में दक्षिण भारत पर वानर राज बाली का शासन था और सीता जी को ढूंढते हुए जब भगवान राम की मुलाकात हनुमान ने सुग्रीव से कराई थी तो सुग्रीव ने श्रीराम को बाली के अत्याचारों से अवगत कराया था। जिस पर भगवान राम ने बाली का वध कर दक्षिण भारत के लोगों को बाली के कुशासन अत्याचारी राज से मुक्ति दिलाई थी। मान्यता है कि यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का था और इसीलिए इस दिन को विजय पताका के रूप में गुड़ी फहराई जाती है। जिसके बाद मुख्य रूप से दक्षिण भारत में गुड़ी पड़वा मनाई जाती है।

मान्यताएं-

ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ व खगोलशास्त्री ने अपने अनुसंधान के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीने और वर्ष की गणना करते हुए भारतीय पंचांग की रचना की थी।
एक मान्यता के अनुसार उज्जैनी के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत की शुरुआत की थी। इसी दिन भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया था। माना जाता है कि इसी दिन से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़ा होने लगता है।

गुड़ी पड़वा कैसे मनाया जाता है?

गुड़ी पड़वा के दिन लोग अपने घरों की साफ सफाई कर रंगोली और आम के पत्तों से अपने घर में तोरण बांधते हैं। घर के आगे प्रवेश द्वार पर एक झंडा लगा दिया जाता है और उसके अलावा एक बर्तन बनाकर उस पर रेशम का कपड़ा लपेटकर रखा जाता है। इस दिन भगवान सूर्य देव की पूजा अर्चना के साथ ही सुंदरकांड, मां दुर्गा की अर्चना पूजा एवं मंत्रों का जाप किया जाता है।

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