FEATUREDकविता/शायरी

ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी…. POEM

लेखक - प्रकाश सिंह चौहान (कर्मचारी, भारतीय नवल सेना)

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र व वर्तमान में भारतीय नवल सेना में अपनी सेवाएं दे रहे प्रकाश सिंह चौहान द्वारा यह कविता कॉलेज के दिनों में लिखी गई थी। प्रकाश सिंह चौहान, बीएचयू में पढ़ने के दौरान मेरे सहपाठी रहे हैं, आज उनकी रचना Social media पर दिखी तो सोचा शेयर कर दूं…….

जब दबंगों से पड़ता हैं डरना और लफंगों का सुनना पड़ता हैं कहना।
ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

जब पड़े गांधी के विचारों पर चलना, उसके बाद भी हैवानों का तमाचा सहना ।

ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

जब घूस से भ्रष्ट कर्मचारियों का जेब पड़े भरना
उसके बाद भी, उसी का सुनना पड़े ताना-बाना ।
ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

जब अमीरों की नीयत ही हो जाएं लूटना-पूतना,
उसके बाद भी, उसी के चौखट पर पड़े पहुँचना।
ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

जब चापलूसी ही बन जाय सभी व्यक्ति और विभाग का गहना,
उसके बाद भी विकास और विश्वास की बात करना ।
ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

जब सोचो की अब किसी से भी नहीं हैं लड़ना – झगड़ना
उसके बाद भी लोगो द्वारा बार-बार सताना।
ये मजबूरी हैं या हैं कोई कमजोरी….

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