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सोनभद्र में विकास का बांट जोहता आदिवासी बनवासी समाज।

किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधेगी आदिवासी अंचल की जनता?

12 जनवरी 1954 को देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जब चुर्क सीमेंट फैक्ट्री का उद्घाटन करने आए थे तो सोनभद्र की प्राकृतिक सुंदरता देखकर मोहित हो गए थे और कहा था कि एक दिन यह क्षेत्र भारत का स्विट्जरलैंड बनेगा। बातें बातें होती हैं और बातों का क्या? लेकिन उपेक्षा के कारण पूर्व प्रधानमंत्री का सपना आज तक साकार नहीं हो सका और देश जब आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है तब भी सोनभद्र के सुदूरवर्ती अंचलों में निवासरत आदिवासी गिरीवासी वनवासी समाज विकास का बाट जोहते हुए एक उम्मीद लिए वही खड़ा है जहां देश के आजाद होते हुए समय नेताओं ने उन्हें विकास का झुनझुना थमाया था। खैर, लोकतंत्र का महापर्व मतदान का अवसर फिर से जनता के बीच है और सोनभद्र जिले के चारों विधानसभा क्षेत्रों में सभी पार्टी के नेताओं ने विकास के खोखले वादों की झड़ी लगा रखी है।

Photo : Social Media

आजादी के 7 दशक बाद पहली बार ओबरा व दुद्धी में कमल खिला लेकिन आज भी इन आदिवासी बहुल क्षेत्र में आदिवासियों के विकास के नाम पर केवल मूर्ति लगायी गई और ओबरा-दुद्धी विधानसभा के एक हिस्से में दूधिया रोशनी में लोग अपना ऐसो आराम की जिंदगी जी रहे हैं तो वहीं ओबरा (Obara) व दुद्धी विधानसभा (Duddhi) का आदिवासी बहुल क्षेत्र गांव आज भी शिक्षा, सड़क पानी, बिजली, स्वास्थ्य के लिए दर-दर भटकते देखे जा सकते हैं। ऐसे में आदिवासियों के लिए आजादी के क्या मायने हैं? और 21वीं सदी के भारत से सोनभद्र की आदिवासी समाज का कोई सरोकार नहीं है, उन्हें तो सिर्फ़ 2 वक्त के रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करना पड़ता है। इनकी सुध लेने वाले ना तो 70 साल बाद खिले कमल के प्रत्याशी आए और ना ही अखिलेश का विकास काम आया, ना ही बसपा (BSP) का सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय काम आया, इनको अपना मेहनत ही काम आया। गर्मी का दिन शुरू होते ही आदिवासी अंचल क्षेत्रों में चूहाड़ (गड्ढा खोदकर या पहाड़ो के दरारों के बीच रिसते पानी) से पानी पीने को जनता बेबस रहती हैं। ईन आदिवासी समाज के निवासरत इलाकों में महिलाओं को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। हालांकि भाजपा (BJP) सरकार ने नल जल योजना के माध्यम से सोना अंचल के वनवासी समाज तक भी शुद्ध पेयजल आपूर्ति की योजना बनाई है। लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि देश का एक ऐसा जिला जहां के वनवासी समाज तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने में सात दशक का सफर तय करना पड़ा और अभी और इंतजार करना पड़ सकता है।

जनपद के एक हिस्से में पावर प्लांट के कारण दूधिया रोशनी तो दूसरे क्षेत्र में भरण पोषण के लिए जूझता आदिवासी समाज

सोनांचल के नाम से पता चलता है कि सोन नदी (Sone River) के किनारे बड़े भूभाग में बसा एक क्षेत्र, जहां प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। लेकिन जंगल जमीनों पर अधिकार रखने वाले मूल आदिवासी आज भी ठगी का शिकार हो रहे हैं और गैर जनपद व प्रदेश के व्यापारी अपने कुटिल चालों से भोले-भाले आदिवासियों को ठगने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। आदिवासी समाज अपनी जंगल व जमीन से निकलने वाले पत्थर, बोल्डर, बालू, गिट्टी आदि के कार्यों में भागीदार होने के बजाय मजदूर बनकर रह जाते हैं और बाहरी व्यापारी देखते देखते धनकुबेर हो जाते हैं। कुछ हद तक शिक्षा का प्रसार होने पर आदिवासी समाज के लोग भी अब व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं लेकिन उनकी संख्या बेहद सीमित है। आदिवासी अंचलों में शिक्षा का घोर अभाव है और मूलभूत सुविधाओं के लिए वनवासी समाज को आए दिन जूझना पड़ रहा है। 2022 विधानसभा चुनाव में आदिवासी समाज को फिर से आस लगी है कि सामाजिक सरोकार की सोच वाले नेता यदि चुने जाएंगे तो उनकी समाज के उत्थान के तरफ कदम बढ़ाए जाएंगे। लेकिन आदिवासी समाज को यह डर भी सताता रहता है कि चुनाव खत्म होते ही कहीं यह नेता नगरी अपनी मांद में ऐसो आराम के बीच लौट ना जाए और आदिवासी अंचल समाज फिर ठगा रह जाए? सोनभद्र के जनप्रतिनिधियों को याद रखना होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में देश में सर्वाधिक नोटा (NOTA) का प्रयोग सोनभद्र की जनता ने ही किया था।

जैसे जैसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ते जा रही है वैसे-वैसे, धीरे धीरे प्रत्याशियों को भी सर्दी में गर्मी का एहसास होने लगा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण की कड़ी में सोनभद्र में 7 मार्च को मतदान होना है। सभी प्रमुख पार्टियों के प्रत्याशियों ने नामांकन कर लिया है और अपने समर्थकों के साथ विधानसभा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जनसंपर्क व प्रचार-प्रसार में जुट गए हैं। इसके साथ ही वादों और दावों का भी दौर अब शुरू हो गया है। हर किसी की यही कोशिश होती है कि खुद को दूसरे के बेहतर बता सके। इसी कोशिश में यह विरोधियों की खामियां भी गिनाते हैं। कांग्रेस (Congress) ने इस चुनाव में नारा “लड़की हूं लड़ सकती हूं” दिया, इसके जरिए उसने सपा (SP) बसपा (BSP) और भाजपा के शासनकाल पर ताबड़तोड़ हमला जारी रखा है। वहीं “बाबा का बुलडोजर”, “सपा का विकास” का भी नारा चुनाव मैदान में आ गया है। चुनाव में भाजपा का स्लोगन “इमानदार काम असरदार” ही प्रचार का मुख्य आधार बनाया गया है वहीं “यूपी में बाबा का बुलडोजर, माफिया का खात्मा” प्रचार भी लोगों के जेहन में डाली गई है।

चुनाव प्रचार के बीच तमाम जुमलो का भी उपयोग जमकर किया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि प्रचार के दौरान एक नेता के समर्थकों ने दूसरे को पप्पू का जोकर का नाम दिया तो जवाब में दूसरे के समर्थक ने पहले नेता को फेंकू और जुमलेबाज कहा, एक ने कहा नेता छुट्टी मना रहे हैं तो दूसरे ने पलटकर कहा नेता विदेश यात्राओं में ही व्यस्त रहते हैं, इस तरह के चुनावी सरगर्मियां ओबरा व दुद्धी विधानसभा के चट्टी चौराहो पर शुरू हो गई है। ओबरा विधानसभा व दुद्धी विधानसभा में आदिवासी वनवासी समाज ही प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करने की स्थिति में निर्णायक भूमिका अदा करता है। अब तो आने वाला समय ही बताएगा किसके सिर पर जीत का सेहरा बांधेगी आदिवासी अंचल की जनता?

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