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MP में पेंशन पॉलिटिक्स: शिवराज सरकार के सामने धर्म संकट?

मध्यप्रदेश में क्या बहाल होगी पुरानी पेंशन योजना?

मध्य प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव है और पुरानी पेंशन योजना लागू करने से सरकार में शामिल सहयोगी दलों को चुनावी लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है। ‌ पुरानी पेंशन योजना लागू करने की नीति मजबूत वोट बैंक बनाने की रणनीति भी हो सकती है। राजस्थान और झारखंड की सरकारों ने पुरानी पेंशन योजना लागू कर दी है। जिसके बाद से मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार पर पुरानी पेंशन योजना लागू करने का दबाव बढ़ता जा रहा है। विभिन्न कर्मचारी संगठनों ने पुरानी पेंशन योजना ना लागू करने पर आंदोलन का हूंकार कर दिया है और कांग्रेस पार्टी भी इस मुद्दे पर कर्मचारियों के साथ खड़ी हो गई है। मध्यप्रदेश और राजस्थान में एक साथ 2023 में विधानसभा चुनाव होने हैं और विधानसभा चुनाव जीतने की रणनीति, भाजपा और कांग्रेस ने अभी से बिछानी शुरू कर दी है।

विशेषज्ञों की माने तो मध्य प्रदेश की वर्तमान शिवराज सरकार यदि पुरानी पेंशन योजना लागू करती है तो 12 वर्षों तक कोई आर्थिक बोझ नहीं आएगा। उसे प्रदेश के लगभग 3 लाख कर्मचारियों के अंशदाई पेंशन के तहत हर माह 14% की हिस्सेदारी से करिए 344 करोड रुपए की बचत होगी, लेकिन इसमें राजनीतिक पेंच भी फंसा हुआ है। देश में नई पेंशन स्कीम योजना अटल बिहारी बाजपेयी की नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार ने लागू की थी और अपनी ही पार्टी द्वारा लागू पेंशन योजना को शिवराज सरकार कैसे बदलें? इसी धर्म संकट में फंसे हुए हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव कृपा शंकर शर्मा बताते हैं कि सरकारी सेवाओं में 1 अप्रैल 2004 से फैमिली पेंशन खत्म कर दी गई थी। सरकार का यह कदम उचित नहीं था। पेंशन यह एक ऐसा आकर्षण हैं जो लोगों को सरकारी सेवाओं में आने के लिए प्रेरित करता है। सातवें वेतन आयोग में इसकी अनुशंसा भी है और यदि सरकार इसे मानती है तो कर्मचारियों के हित में फायदेमंद साबित होगा।

वर्तमान में लागू पेंशन योजना (NPS) के तहत कर्मचारी अपने मासिक वेतन का 10% भुगतान करते हैं और सरकार भी इतना ही भुगतान करती थी, लेकिन मई 2021 से सरकार ने अपना हिस्सा 4% बढ़ा दिया है। अब कर्मचारी के वेतन का 24% पेंशन के नाम पर लिया जाता है। बाद में इस हिस्से को इक्विटी शेयरों में निवेश किया जाता है और सेवानिवृत्ति पेंशन उस निवेश के रिटर्न पर आश्रित है। पुरानी पेंशन योजना में पूरी पेंशन राशि सरकार द्वारा ही दी जाती थी और कर्मचारी के सैलरी से राशि नहीं काटी जाती थी। कर्मचारी को रिटायरमेंट के बाद हर महीने मिलने वाली पेंशन उसके वेतन से आधी राशि होती थी।

1 जनवरी 2005 के बाद 3.35 लाख कर्मचारी सरकारी सेवा में आए हैं। इसमें सबसे ज्यादा अध्यापक वर्ग है, जिसकी संख्या 2.87 लाख है। सरकार हर महीने उनके मूल वेतन का 14% अंशदान राशि लगभग ₹7000 खाते में जमा करती है। यानी सरकार को हर माह 210 करोड रुपए का अतिरिक्त वहन करना पड़ रहा है। इसी तरह 48000 अस्थाई कर्मचारियों पर सरकार को ₹3000 के हिसाब से 134 करोड़ रुपए अपनी हिस्सेदारी देनी पड़ रही है। कुल मिलाकर वर्तमान शिवराज सरकार पर हर महीने 344 करोड रुपए का बोझ है। विशेषज्ञों की राय अनुसार इन सभी कर्मचारियों और अधिकारियों की 30 साल की नौकरी 2035 में पूर्ण होगी। यदि पुरानी पेंशन योजना बहाल होती है तो सरकार पर आर्थिक बोझ 12 साल बाद आएगा, जबकि इन 12 सालों में सरकार को हर महीने 344 करोड रुपए बचत होगी।

विशेषज्ञों की राय अनुसार शिवराज सिंह चौहान यदि मध्यप्रदेश में पुरानी पेंशन योजना लागू करने की ओर कदम बढ़ाते हैं तो उनके सामने सबसे बड़ा धर्म संकट है कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार द्वारा लागू नई पेंशन योजना को कैसे बदलें? लेकिन राजनीतिक पंडितों का अनुमान है कि 2023 में भाजपा को मध्यप्रदेश में फिर से कमल खिलानी है तो पुरानी पेंशन योजना लागू करना, सबसे उत्तम रणनीति होगी क्योंकि कांग्रेस ने पुरानी पेंशन योजना की मांग कर रहे श्रमिक संगठनों के साथ खड़े होने की बात कह कर अपना कदम बढ़ा दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वर्तमान भाजपा सरकार मध्यप्रदेश में अपनी ही सरकार द्वारा लागू नहीं पेंशन योजना को कैसे बदल पाएगी?

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