FEATUREDउत्तर प्रदेशधर्म/संस्कृतिबिहारभारतसोनभद्र

छठ पूजा में सूप से क्यों की जाती है पूजा? क्या है महत्व?

काच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए.....

शक्तिनगर। हिंदू सनातन धर्म परंपरा में यदि किसी वस्तु का उल्लेख किया जा रहा है, तो निश्चित ही उसका जीवन में विशेष अर्थ होता है। दीपावली के बाद छठ पूजा आते ही खरीदारी शुरू हो जाती है। इस बार खबरों पर विश्वास करें तो उर्जान्चल में सुपली और दऊरी महंगी बिक रही है। छठ पूजा की खरीदारी करने के लिए बाजारों में भीड़ जुट रही है और छठ व्रत करने के लिए नई सूप-दउरी खरीदारी जारी है। आखिर छठ पूजा में यह सूप इतना जरूरी क्यों है?

सूप के महत्व का राज छिपा है, इसके बनने के पीछे की कहानी में, दरअसल सूप का निर्माण बांस से होता है। संस्कृत में बांस को वंश या वंशिका कहते हैं। बांस धरती पर पाई जाने वाली इकलौती ऐसी घास है जो सबसे तेजी से बढ़ती है। इसी बांस की बनी बांसुरी को श्रीकृष्ण ने अपने होठों पर सजाया है। अंदर से खोखली, लेकिन फूंक मार दो तो जीवन में सुर घोल देने वाली बांसुरी बन जाती है। बताते हैं कि बांस में खुद श्रीहरि विष्णु का निवास है तो इसके धारीदार पत्ते शिव के स्वरूप हैं। इस तरह बांस का पेड़ हरिहर स्वरूप भी है।

जब भी कभी सुख में वृद्धि की कामना की जाती है तो कहा जाता है कि बांस की तरह दिन दोगुनी, रात चौगुनी प्रगति हो। दरअसल बांस सिर्फ 8 हफ्तों में 60 फीट की उच्चाई तक जा सकता है। कई बार तो एक दिन में बांस एक मीटर तक बढ़ जाती है। इसी बांस की खपच्चियों से बनी सुपली से जब छठ व्रत का अनुष्ठान किया जाता है तो यह मान्यता होती है कि वंशबेल में इसी तरह की वृ़द्धि होती रहे और जैसे बांस तेजी से निर्बाध गति से बढ़ जाता है। सुप से अर्घ्य देकर कामना की जाती है कि घर-परिवार और उसकी तरक्की बढ़ने में भी कोई बाधा न आए।

कहावत सुनने को मिलता है कि डूबते को तिनके का सहारा। लोक आस्था मान्यतानुसार यह तिनका कुछ और नहीं बांस ही है। जब धरती पर जल प्रलय हुआ, स्वयंभू मनु को नाव बनानी हुई तो उन्होंने बांस की बल्लियों को जोड़कर ही एक बड़ी नौका तैयार की थी। जिस दिन प्रलय ने धरती को डुबोना शुरू किया तो नाव तक पहुंचने के रास्ते पर जल ही जल भर गया। तब मनु एक बांस के सहारे ही नाव तक पहुंचे और श्रीहरि ने हर परिस्थिति में रक्षा का वचन दिया था, इसलिए मनु ने बांस को भी उनका एक स्वरूप ही माना था।

एक और कथा सुनने को मिलती है कि एक बार ऋषि परशुराम के क्रोध से धरती डोलने लगी थी तब देवताओं ने बांस से टेक लगाकर सहारा दिया। खुद शेषनाग, जिनके फन पर ये धरती टिकी हुई है, वह जब लक्ष्मण के रूप में त्रेतायुग में थे, मेघनाद के शक्तिबाण से आहत होने के बाद भूमि पर गिर पड़े। उस समय धरती का संतुलन बिगड़ ही जाता, अगर ऐन मौके पर महादेव शिव ने बांस का सहारा देकर उसे रोक न लिया होता।

कृष्णावतार में श्रीकृष्ण जन्म के तुरंत बाद ही बांस के बने सूप में लिटाए गए और उनके पिता ने सिर पर रखकर उन्हें यमुना पार गए थे। जब यमुना नदी का पानी सूप तक पहुंचने लगा, तब श्रीकृष्ण ने सूप से अपने पांव नीचे लटका दिए। मां यमुना उन्हें प्रणाम कर वापस तल पर लौट गईं और वसुदेव जी को नदी पार करने का मार्ग दे दिया। यानी खुद बांस के सूप ने भगवान की रक्षा की है।

सूप का स्वभाव बड़े ही सज्जन व्यक्ति जैसा होता है। वह बुराई को अपने पास रखता ही नहीं है। सिर्फ जरूरत की चीजें थामे रखता है। वह केवल साबुत और अच्छे अनाज को अपनी गहराई में जगह देता है, हल्के-फुल्के, टूटे-कचरे अनाज और छिलकों को उड़ा देता है। महात्मा कबीर इसी साधारण सी बात को अपने दोहे में कहकर सज्जन व्यक्तियों का चरित्र बता डालते हैं।

सूप को लेकर एक कहावत और भी है “सूप तो सूप, चल्हनियों बोले, जिसमें बहत्तर छेद”। ये कहावत आदमी के आवश्यकता से अधिक बोलने पर रोक लगाने के लिए है। थोथा उड़ाते हुए सूप को फटकना पड़ता है तब उंगलियों की थाप से फट-फट की आवाज आती है। लेकिन चल्हनी से चाल्हते वक्त बेवजह ही झन-झन की आवाज आती है। सूप की फटकार में सुर है, लेकिन चल्हनी की आवाज कर्कष होती है। हालांकि दोनों का अपना महत्व है, लेकिन समाज ऐसा मानत हैं तो क्या किया जाए। मानने पर कोई तर्क थोड़े ही लागू होता है। कुल मिलाकर सूप ही जीवन है। जीवन का आधार है। यह जीवन की शुरुआत और रक्षा का भी प्रतिक है। एक उम्दा जिंदगी जीनी है तो स्वभाव सूप जैसा ही होना चाहिए, ऐसा घर के बड़े-बुजुर्ग कहते आए हैं।

छठ पूजा में सूप महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह सूप पानी में उतराता-समाता है, फिर बाहर बनी वेदी पर रख दिया जाता है। लोगों की दिलचस्पी उसमें रखे प्रसाद पर होती है। प्रसाद बांट दिए जाते हैं और सूप खाली है, किसी के लिए उसका कोई मतलब नहीं, लेकिन उसी खाली सूप को व्रती महिला अपने सिर-माथे से लगा लेती है। वह कुछ बुदबुदाती हुए कह रही है कि हे छठी मैया बस ऐसे ही मेरे घर में वृद्धि-बढ़ोतरी करते रहना, मेरे बच्चों को प्रसन्न रखना, तरक्की बनाए रखना और जैसे खराब दानो और छिलकों को उड़ा कर दूर कर देते हो, बाधाओं को ऐसे ही उड़ा देना। हे सूप महाराज, बस इतना ही करना। सार-सार को गहि रहना, थोथा उड़ा देना।छठ घाट पर व्रती महिला के पीछे बैठी कुछ महिलाएं गीत गा रही हैं- काच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए….

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button